पाषाण काल

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  • पाषाण युगीन संस्कृति को तीन चरणों मे विभाजित किया गया है। ये है – पुरापाषाण काल, मध्य पाषाण काल और नवपाषाण काल
  • सर्वप्रथम चापर-चापिंग पेबुल संस्कृति के उपकरण पंजाब की सोहन नदी घाटी(पाकिस्तान) से प्राप्त हुए हैं।
  • सर्वप्रथम हैंडएक्स संस्कृति के उपकरण मद्रास के समीप बदमदुरै तथा अत्तिरंपक्कम से प्राप्त हुए हैं।
  • रॉबर्ट ब्रूस फुट ब्रिटिश भूगर्भ वैज्ञानिक और पुरातत्वविद थे।
  • जियोलॉजिकल सर्वे से संबद्ध रॉबर्ट ब्रूस फुट ने 1863 ई. में भारत में पाषाणकालीन बस्तियों के अन्वेषण की शुरुआत की।
  • इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जी. आर. शर्मा के निर्देशन में बेलन घाटी में अनुसंधान किया गया।
  • पूर्व पाषाणकाल से संबंधित यहां 44 पुरास्थल प्राप्त हुए हैं।
  • पुरापाषाण कालीन मानव प्रधानतः शिकार पर निर्भर रहते थे।
  • अग्नि के प्रयोग से अपरिचित रहने के कारण वे कच्चा मांस खाते थे।
  • इस युग का मानव शिकारी एवं खाद्य संग्राहक था।
  • इस काल मे मानव को कृषि और पशुपालन का ज्ञान नहीं था।
  • पशुपालन का प्रारंभ मध्य पाषाण काल में हुआ।
  • पशुपालन के साक्ष्य भारत में आदमगढ़ (होशंगाबाद, म.प्र.) तथा बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान) से प्राप्त हुए हैं।
  • मध्य पाषाण कालीन महदहा (प्रतापगढ़, उ.प्र.) स्थल से हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं।
  • जी. आर. शर्मा ने महदहा के तीन क्षेत्रों का उल्लेख किया है।
  • ये क्षेत्र हैं – बूचड़खाना संकुल क्षेत्र, झील क्षेत्र एवं कब्रिस्तान निवास क्षेत्र।
  • हड्डी एवं सिंग निर्मित उपकरण तथा आभूषण बड़े पैमाने पर बूचड़खाना संकुल क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं।
  • डॉ. जयनारायण पाण्डेय अपनी पुस्तक ‘पुरातत्व विमर्श’ में सराय नाहर राय, महदहा एवं दमदमा स्थल से हड्डी के उपकरण एवं आभूषण प्राप्त होने का उल्लेख किया है।
  • दमदमा में उत्खनन के फलस्वरूप पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों से कुल 41 मानव शवाधान ज्ञात हुए हैं।
  • इन शवधानों एक शवाधान में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए हुए मिले है तथा 5 शवाधान युग्म शवाधान है।
  • इस प्रकार कुल 48 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं।
  • सराय नाहर राय से ऐसी समाधि प्राप्त हुई है जिसमे चार मानव कंकाल एक साथ दफनाए गए थे।
  • लेहखिया से सत्रह मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं।
  • जॉन आर. लुकास (ओरेगॉन विश्वविद्यालय, अमेरिका) के अनुसार, लेखहिया से 27 मानव कंकालों की अस्थियां मिली है।
  • भारत में मानव का सर्वप्रथम साक्ष्य मध्य प्रदेश के पश्चिमी नर्मदा क्षेत्र से मिला है।
  • नर्मदा क्षेत्र की खोज वर्ष 1982 में की गई थी।
  • मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल बुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) से प्राप्त हुआ।
  • गर्त आवास के साक्ष्य भी बुर्जहोम से प्राप्त हुए।
  • बुर्जहोम पूरास्थल की खोज वर्ष 1935 में डी टेरा एवं पीटरसन ने की थी।
  • सर्वप्रथम खाद्यान्नों का उत्पादन नवपाषाण काल में प्रारंभ हुआ। बलूचिस्तान के कच्छ मैदान स्थित मेहरगढ़ से सर्वप्रथम प्राचीनतम स्थायी जीवन के प्रमाण मिले।
  • नवपाषाण कालीन स्थल गुफकराल कश्मीर में स्थित है।
  • यहां के लोग कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थे।
  • नवपाषाण कालीन स्थल चिरांद बिहार के सारण जिले में स्थित है।
  • यहां से हड्डी एवं हिरण के सिंगों से निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं।
  • कर्नाटक के संगनकल्लू नामक नवपाषाण कालीन पुरास्थल से राख के टीले प्राप्त हुए हैं।
  • उतनूर, पिकलीहल आदि स्थलों से भी राख के टीले मिले हैं।
  • धातुओं में सबसे पहले तांबे का प्रयोग हुआ।
  • कैलकोलिथिक युग को ताम्र पाषाण युग के नाम से भी जाना जाता है।
  • अहाड़ का प्राचीन नाम ताम्बवती अर्थात तांबा वाली जगह है।
  • गिलुन्द में तांबे के टुकड़े मिले है।
  • कायथ संस्कृति की लगभग 40 बस्तियां मालवा क्षेत्र से प्राप्त हुई है।
  • जोर्वे संस्कृति के प्रमुख पुरास्थल हैं – अहमदनगर जिले में जोर्वे, नेवासा और दैमाबाद; पुणे जिले में चंदोली, इनामगावँ, प्रकाश और नासिक।
  • अब तक ज्ञात 200 जोर्वे स्थल में गोदावरी का दैमाबाद सबसे बड़ा है।
  • पटसन का साक्ष्य नेवासा (जोर्वे संस्कृति स्थल) से प्राप्त हुआ है।
  • महाराष्ट्र की ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति (जोर्वे संस्कृति) के नेवासा, दैमाबाद, इनामगांव, चंदोली आदि पुरास्थलों में मृतकों को अस्थि कलश में रखकर उत्तर से दक्षिण दिशा में घरों के फर्श के नीचे दफनाए जाने का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
  • नवदाटोली, मध्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण ताम्र पाषाणिक पुरास्थल है, जो इंदौर के निकट स्थित है।
  • नवदाटोली का उत्खनन एच.डी. सांकलिया ने कराया था। नावदातोली के लोग बेर और अलसी भी उपजाते थे।
  • दक्कन की काली मिट्टी में कपास की पैदावार होती थी।
  • पश्चिमी महाराष्ट्र में आरंभिक ताम्रपाषाण अवस्था इनामगांव स्थल  चूल्हो-सहित बड़े-बड़े कच्ची मिट्टी के मकान और गोलाकार गड्ढ़ों वाले मकान मिले है।
  • बाद की अवस्था (1300 – 1000 ई.पू.) में पांच कमरों वाला एक मकान मिला है जिसमें चार कमरे आयताकार हैं और एक वृत्ताकार।
  • यह मकान बस्ती के केंद्र में है और किसी सरदार का रहा होगा।
  • इनामगांव में 100 से अधिक घर और कई कब्रें पाई गई है।
  • यह बस्ती किलाबंद है और खाई से घिरी हुई है।
  • यहां शिल्पी या पंसारी लोग पश्चिमी छोर पर रहते थे जबकि सरदार प्रायः केंद्र स्थल में रहता था।
  • ताम्रपाषाण युग के लोग तांबे के शिल्प-कर्म में निःसंदेह बड़े दक्ष थे और पत्थर का काम भी अच्छा करते थे।
  • वे कार्नेलियन, स्टेटाइट और क्वार्टज क्रिस्टल जैसे अच्छे पत्थरों के मनके गुटिकाएं भी बनाते थे।
  • वे लोग कताई और बुनाई जानते थे क्योंकि मालवा में चरखे और तकलियां मिली है।
  • महाराष्ट्र में कपास, सन और सेमल के रुई के बने धागे भी मिले हैं।
  • इनामगांव में कुम्भकार, धातुकार, हाथी-दांत के शिल्पी, चुना बनाने वाले और मिट्टी की मूरतें (टेराकोटा) के खिलौने बनाने वाले कारीगर भी दिखाई देते हैं।
  • इनामगांव में मातृ-देवी की प्रतिमा मिली है जो पश्चिमी एशिया में पाई जाने वाली ऐसी प्रतिमा से मिलती है।
  • मालवा और राजस्थान में मिली रूढ़ शैली में बनी मिट्टी की वृषभ-मूर्तिकाएँ यह सूचित करती है कि वृषभ (सांड) धार्मिक पंथ का प्रतीक था।
  • महाराष्ट्र में मृतक को उत्तर-दक्षिण दिशा में रखा जाता था, किन्तु दक्षिण भारत में पूरब-पश्चिम दिशा में।
  • पश्चिमी भारत में लगभग सम्पूर्ण (एक्सटेंडेड बरिअल) शवाधान प्रचलित था, जबकि पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान (फ़्रेक्शनल बरिअल) चलता था।
  • पश्चिमी महाराष्ट्र की चंदौली नेवासा बस्तियों में पाया गया है कि कुछ बच्चों के गलों में तांबे के मनके का हार पहना कर उन्हें दफनाया गया है, जबकि अन्य बच्चों की कब्रों में सामान के तौर पर कुछ बर्तन मात्र है।
  • इनामगांव में एक वयस्क आदमी मृदभांडों और कुछ तांबे के साथ दफनाया गया है।
  • कायथा के एक घर में तांबे के 29 कंगन और दो अद्वितीय ढंग की कुल्हाड़ियां पाई गई हैं।
  • इसी स्थान में स्टेटाइट और कार्नेलियन जैसे कीमती पत्थरों की गोलियों के हार पात्रों जमा पाए गए हैं।
  • गणेश्वर स्थल राजस्थान में खेत्री ताम्र-पट्टी के सीकर-झुंझनू क्षेत्र के तांबे की समृद्ध खानों के निकट पड़ता है।
  • इस क्षेत्र से खुदाई में निकली तांबे की वस्तुएं हैं – तीर के नोक, बरछे का फल, बंसियां, सेल्ट, कंगन, छेनी आदि।
  • इनमें से कुछ की आकृतियां सिंधु स्थलों में मिली इन वस्तुओं की आकृतियों से मिलती है।
  • यहां गैरिक मृदभांड भी पाया गया है।
  • सबसे बड़ी निधि मध्य प्रदेश के गुंगेरिया से प्राप्त हुई है।
  • इसमें 424 तांबे के औजार और हथियार तथा 102 चांदी के पतले परत है।
  • गुफाओं के शैल चित्र भीमबेटकासे प्राप्त हुए है।
  • भीमबेटका मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में है।
  • यूनेस्को ने भीमबेटका शैल चित्रों को विश्व विरासत सूची में सम्मिलित किया है।
  • भीमबेटका को जुलाई, 2003 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।

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